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​अजब गॉव की गजब कहानी – यहाँ पटवारी के पास ‘अलादीन का चिराग ‘ बिना आदेश के गायब होती है जमीन …

By Khabar Khule Aam Desk

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डेस्क खबर खुलेआम

गणेश भोय जिला ब्यूरो जशपुर

​पत्थलगांव (जशपुर)। अगर आप समझते हैं कि जमीन-जायदाद के लिए रजिस्ट्री, गवाह और कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं, तो शायद आप पत्थलगांव तहसील के “चमत्कारों” से वाकिफ नहीं हैं। यहाँ के राजस्व रिकॉर्ड में ऐसी ‘दैवीय शक्तियाँ’ काम कर रही हैं, जहाँ पसीने से सींची गई किसान की जमीन रातों-रात सरकारी पन्नों से वैसे ही गायब हो जाती है, जैसे गधे के सिर से सींग!

​डिजिटल इंडिया में ‘मिस्टर इंडिया’ वाला खेल :​मामला ग्राम पत्थलगांव का है, जहाँ स्व. सालिकराम नाम के एक किसान की 2.015 हेक्टेयर जमीन थी। बेचारे वारिसान (पेरोन बड़ा और उनके भाई) इस भरोसे बैठे थे कि पिता की विरासत उनके पास है। लेकिन साहब, यहाँ तो सिस्टम ही ‘जादूगर’ निकला! बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के, बिना किसी आवेदन के और बिना किसी को कानो-कान खबर लगे, रिकॉर्ड से सालिकराम का नाम ऐसे “विलोपित” (डिलीट) कर दिया गया मानो वो कोई पेंसिल से लिखा रफ काम हो।

​पटवारी की ‘ईमानदार’ लाचारी : ​जब मामला बढ़ा और पटवारी साहब ने अपनी रिपोर्ट पेश की, तो उन्होंने बड़े ही मासूमियत भरे अंदाज में कबूल किया कि- “हुजूर, साल 2011 तक तो जमीन सालिकराम की थी, लेकिन 2013 के आते-आते यह सुशीला कुजूर के नाम कैसे हो गई, इसका कोई कागज ही नहीं मिल रहा!” वाह! यानी तहसील कार्यालय में दस्तावेज “मिस्टर इंडिया” की घड़ी पहनकर घूम रहे हैं। न फाइल का पता, न आदेश की कॉपी, बस नाम बदल गया। इसे कहते हैं – “न खाता, न बही, पटवारी जी जो कहें, वही सही!”

​म्युटेशन का नया तमाशा :​अब तमाशा देखिए, जिस जमीन का आधार ही गायब था, उस पर अब नए किरदारों की एंट्री हुई है। तहसीलदार साहब ने आदेश जारी किया है कि अब इस जमीन से सुशीला जी का नाम हटाकर नरेश कुमार सिदार, किशन सिंह और विकास राठिया के नाम का “तिलक” लगाया जाए। मतलब, नींव गायब है लेकिन ऊपर मंजिलें दर मंजिलें खड़ी की जा रही हैं।

​सिस्टम से कुछ ‘कड़वे’ सवाल :

  • ​सॉफ्टवेयर का दोष या नीयत का खोट? क्या पटवारी कार्यालय में कोई ऐसा ‘वायरस’ घुस गया है जो सिर्फ गरीबों के नाम डिलीट करता है और रसूखदारों के नाम इंसर्ट?
  • ​बिना कागज के नामांतरण: क्या अब पथलगाँव में जमीन के मालिक बनने के लिए दस्तावेजों की नहीं, बल्कि “अदृश्य आर्शीवाद” की जरूरत पड़ती है?
  • ​फाइल की तलाश: अगर सुशीला कुजूर के नाम जमीन चढ़ाने का कोई दस्तावेज रिकॉर्ड रूम में नहीं है, तो क्या उसे किसी चूहे ने खा लिया या सिस्टम की दीमक चट कर गई?

    पत्थलगांव तहसील का यह कारनामा उन सभी लोगों के लिए सबक है जो अपनी जमीन के कागजात बक्से में बंद करके चैन की नींद सो रहे हैं। जाग जाइए! वरना कल को पटवारी जी की रिपोर्ट आएगी – “साहब, आपकी जमीन तो थी, पर अब वो किसकी है, ये हमें भी नहीं पता!”

*​​अजब पत्थलगांव की गजब कहानी: यहाँ पटवारी के पास ‘अलादीन का चिराग’, बिना आदेश के गायब हो जाती है जमीन!…

​पत्थलगांव (जशपुर)। अगर आप समझते हैं कि जमीन-जायदाद के लिए रजिस्ट्री, गवाह और कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं, तो शायद आप पत्थलगांव तहसील के “चमत्कारों” से वाकिफ नहीं हैं। यहाँ के राजस्व रिकॉर्ड में ऐसी ‘दैवीय शक्तियाँ’ काम कर रही हैं, जहाँ पसीने से सींची गई किसान की जमीन रातों-रात सरकारी पन्नों से वैसे ही गायब हो जाती है, जैसे गधे के सिर से सींग!

​डिजिटल इंडिया में ‘मिस्टर इंडिया’ वाला खेल :​मामला ग्राम पत्थलगांव का है, जहाँ स्व. सालिकराम नाम के एक किसान की 2.015 हेक्टेयर जमीन थी। बेचारे वारिसान (पेरोन बड़ा और उनके भाई) इस भरोसे बैठे थे कि पिता की विरासत उनके पास है। लेकिन साहब, यहाँ तो सिस्टम ही ‘जादूगर’ निकला! बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के, बिना किसी आवेदन के और बिना किसी को कानो-कान खबर लगे, रिकॉर्ड से सालिकराम का नाम ऐसे “विलोपित” (डिलीट) कर दिया गया मानो वो कोई पेंसिल से लिखा रफ काम हो।

​पटवारी की ‘ईमानदार’ लाचारी : ​जब मामला बढ़ा और पटवारी साहब ने अपनी रिपोर्ट पेश की, तो उन्होंने बड़े ही मासूमियत भरे अंदाज में कबूल किया कि- “हुजूर, साल 2011 तक तो जमीन सालिकराम की थी, लेकिन 2013 के आते-आते यह सुशीला कुजूर के नाम कैसे हो गई, इसका कोई कागज ही नहीं मिल रहा!” वाह! यानी तहसील कार्यालय में दस्तावेज “मिस्टर इंडिया” की घड़ी पहनकर घूम रहे हैं। न फाइल का पता, न आदेश की कॉपी, बस नाम बदल गया। इसे कहते हैं – “न खाता, न बही, पटवारी जी जो कहें, वही सही!”

​म्युटेशन का नया तमाशा :​अब तमाशा देखिए, जिस जमीन का आधार ही गायब था, उस पर अब नए किरदारों की एंट्री हुई है। तहसीलदार साहब ने आदेश जारी किया है कि अब इस जमीन से सुशीला जी का नाम हटाकर नरेश कुमार सिदार, किशन सिंह और विकास राठिया के नाम का “तिलक” लगाया जाए। मतलब, नींव गायब है लेकिन ऊपर मंजिलें दर मंजिलें खड़ी की जा रही हैं।

​सिस्टम से कुछ ‘कड़वे’ सवाल :

​फाइल की तलाश: अगर सुशीला कुजूर के नाम जमीन चढ़ाने का कोई दस्तावेज रिकॉर्ड रूम में नहीं है, तो क्या उसे किसी चूहे ने खा लिया या सिस्टम की दीमक चट कर गई?

पत्थलगांव तहसील का यह कारनामा उन सभी लोगों के लिए सबक है जो अपनी जमीन के कागजात बक्से में बंद करके चैन की नींद सो रहे हैं। जाग जाइए! वरना कल को पटवारी जी की रिपोर्ट आएगी – “साहब, आपकी जमीन तो थी, पर अब वो किसकी है, ये हमें भी नहीं पता!”

​सॉफ्टवेयर का दोष या नीयत का खोट? क्या पटवारी कार्यालय में कोई ऐसा ‘वायरस’ घुस गया है जो सिर्फ गरीबों के नाम डिलीट करता है और रसूखदारों के नाम इंसर्ट?

​बिना कागज के नामांतरण: क्या अब पथलगाँव में जमीन के मालिक बनने के लिए दस्तावेजों की नहीं, बल्कि “अदृश्य आर्शीवाद” की जरूरत पड़ती है?

​पत्थलगांव (जशपुर)। अगर आप समझते हैं कि जमीन-जायदाद के लिए रजिस्ट्री, गवाह और कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं, तो शायद आप पत्थलगांव तहसील के “चमत्कारों” से वाकिफ नहीं हैं। यहाँ के राजस्व रिकॉर्ड में ऐसी ‘दैवीय शक्तियाँ’ काम कर रही हैं, जहाँ पसीने से सींची गई किसान की जमीन रातों-रात सरकारी पन्नों से वैसे ही गायब हो जाती है, जैसे गधे के सिर से सींग!*​डिजिटल इंडिया में ‘मिस्टर इंडिया’ वाला खेल :*​मामला ग्राम पत्थलगांव का है, जहाँ स्व. सालिकराम नाम के एक किसान की 2.015 हेक्टेयर जमीन थी। बेचारे वारिसान (पेरोन बड़ा और उनके भाई) इस भरोसे बैठे थे कि पिता की विरासत उनके पास है। लेकिन साहब, यहाँ तो सिस्टम ही ‘जादूगर’ निकला! बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के, बिना किसी आवेदन के और बिना किसी को कानो-कान खबर लगे, रिकॉर्ड से सालिकराम का नाम ऐसे “विलोपित” (डिलीट) कर दिया गया मानो वो कोई पेंसिल से लिखा रफ काम हो।*​पटवारी की ‘ईमानदार’ लाचारी :* ​जब मामला बढ़ा और पटवारी साहब ने अपनी रिपोर्ट पेश की, तो उन्होंने बड़े ही मासूमियत भरे अंदाज में कबूल किया कि- *”हुजूर, साल 2011 तक तो जमीन सालिकराम की थी, लेकिन 2013 के आते-आते यह सुशीला कुजूर के नाम कैसे हो गई, इसका कोई कागज ही नहीं मिल रहा!” वाह! यानी तहसील कार्यालय में दस्तावेज “मिस्टर इंडिया” की घड़ी पहनकर घूम रहे हैं। न फाइल का पता, न आदेश की कॉपी, बस नाम बदल गया। इसे कहते हैं – “न खाता, न बही, पटवारी जी जो कहें, वही सही!”**​म्युटेशन का नया तमाशा :*​अब तमाशा देखिए, जिस जमीन का आधार ही गायब था, उस पर अब नए किरदारों की एंट्री हुई है। तहसीलदार साहब ने आदेश जारी किया है कि अब इस जमीन से सुशीला जी का नाम हटाकर नरेश कुमार सिदार, किशन सिंह और विकास राठिया के नाम का “तिलक” लगाया जाए। मतलब, नींव गायब है लेकिन ऊपर मंजिलें दर मंजिलें खड़ी की जा रही हैं।*​सिस्टम से कुछ ‘कड़वे’ सवाल :** ​सॉफ्टवेयर का दोष या नीयत का खोट? क्या पटवारी कार्यालय में कोई ऐसा ‘वायरस’ घुस गया है जो सिर्फ गरीबों के नाम डिलीट करता है और रसूखदारों के नाम इंसर्ट?* ​बिना कागज के नामांतरण: क्या अब पथलगाँव में जमीन के मालिक बनने के लिए दस्तावेजों की नहीं, बल्कि “अदृश्य आर्शीवाद” की जरूरत पड़ती है?* ​फाइल की तलाश: अगर सुशीला कुजूर के नाम जमीन चढ़ाने का कोई दस्तावेज रिकॉर्ड रूम में नहीं है, तो क्या उसे किसी चूहे ने खा लिया या सिस्टम की दीमक चट कर गई?​पत्थलगांव तहसील का यह कारनामा उन सभी लोगों के लिए सबक है जो अपनी जमीन के कागजात बक्से में बंद करके चैन की नींद सो रहे हैं। जाग जाइए! वरना कल को पटवारी जी की रिपोर्ट आएगी – “साहब, आपकी जमीन तो थी, पर अब वो किसकी है, ये हमें भी नहीं पता!”

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