
डेस्क खबर खुलेआम
रायपुर। हिंसा के साए से निकलकर विकास, आत्मसम्मान और नई उम्मीद की राह पर आगे बढ़ रही बस्तर की बेटियों ने राजधानी रायपुर में अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन कर एक नई मिसाल कायम की। राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस के अवसर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में सुकमा जिले के चिंतलनार की पुनर्वासित बेटियों ने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक हथकरघा परिधानों में रैंप वॉक कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।ग्रामोद्योग विभाग की पहल पर आयोजित इस विशेष फैशन शो में पुनर्वासित बेटियों के साथ मिस इंडिया ईस्ट सुश्री अनुष्का सोन ने भी रैंप वॉक किया। पारंपरिक हथकरघा परिधानों से सजी इन बेटियों का आत्मविश्वास और गरिमापूर्ण अंदाज कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा।इस अवसर पर पुनेम देवे, माड़वी देवे, माड़वी माल्ले, मिडियम गांगी, माड़वी नान्दनी, डोंडी रामे, माड़काम भीमे, पोड़ियाम राजे, पुनेम ज्योति और हिड़मे मारकाम सहित चिंतलनार की पुनर्वासित बेटियों ने मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। यह आयोजन महज एक फैशन शो तक सीमित नहीं रहा। रैंप पर कदम बढ़ाती बेटियों के साथ उनके संघर्ष, बदलाव और नए जीवन की कहानी भी सामने आई। कभी हिंसा और भय के माहौल से जुड़ा रहा चिंतलनार आज इन्हीं बेटियों के आत्मविश्वास और नई पहचान की कहानी कहता नजर आया।भय से विश्वास, हिंसा से विकास और भटके हुए जीवन से सम्मानजनक भविष्य की ओर बढ़ते कदमों ने इस आयोजन को खास बना दिया। राजधानी के बड़े मंच पर इन बेटियों का प्रदर्शन पुनर्वास की उस सोच को भी रेखांकित करता है जिसमें आत्मसमर्पण के बाद सम्मानजनक जीवन, हुनर और अवसर के जरिए नई राह तैयार की जा रही है। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने पुनर्वासित बेटियों के इस आत्मविश्वासपूर्ण प्रदर्शन की सराहना की। दोनों ने मंच पर पहुंचकर बेटियों से मुलाकात की और उनका उत्साहवर्धन किया।ग्रामोद्योग विभाग की इस पहल को बेटियों के हुनर को बड़े मंच से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। खास तौर पर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक हथकरघा और बस्तर की बेटियों की प्रतिभा को एक साथ मंच मिलने से कार्यक्रम ने सामाजिक बदलाव और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम प्रस्तुत किया।चिंतलनार की इन पुनर्वासित बेटियों के लिए रायपुर का यह मंच केवल रैंप नहीं था, बल्कि नई पहचान, नए आत्मविश्वास और नए भविष्य की ओर बढ़ने का प्रतीक बन गया। हथकरघा के रंगों में सजी बेटियों ने जब रैंप पर कदम बढ़ाए तो संदेश साफ था—अवसर मिले तो बस्तर की बेटियां भी बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा और हुनर का परचम लहरा सकती हैं।










